Poems

अँधेरा

रात के अँधेरे में एक आहट सुनाई  देती 

एक आहट जो मुझे डरा देती है

अँधेरे से डर तो हमेशा ही लगता था
अँधेरे में जाने से दिल डरता था 
पर अब ये डर थोडा बढ़ गया है 
डर की वजह भी बढ़ गयी है 
मैं सुबह का इंतज़ार करती हूँ 
रात भर सोने से डरती हूँ

सवेरा तो आ जाता है 
पर सुबह नहीं आती है 

अँधेरा चला जाता है 
पर वापिस भी आता  है 

कब आयेगा वो दिन
जब मुझे रात की चिंता न होगी?
कब आयेगा वो सवेरा
जब रात को वो आहट न होगी?

जब किया मैंने ये सवाल

सबने कहा यही रहेगा हाल 
तुम्हे ये सब सेहना ही होगा
ये कड़वा घूँट पीना ही होगा 
नहीं बदलेगा ये कभी 
रहेगा सबकुछ वही का वही 
ये नहीं है सिर्फ मेरा सवाल

फिर क्यों नहीं बदलता हाल?
हैं हम सभी इसके शिकार 
फिर क्यूँ मान जाते हैं सब हार?
डर के जीने से आखिर किसका हुआ भला ?
क्यूँ तू  खुद के लिए अकेले न चला?
तू अकेले कदम  तो बढ़ा 
फिर देख कैसे पूरा देश पीछे होगा खड़ा 
हमें ये अँधेरा मिटाना ही होगा
एक नया सवेरा लाना ही होगा 

8 thoughts on “अँधेरा

  1. Good. Arpita.. I dont have any idea about your state of mind while writing this piece of poetry. Does these lines refelects lonely young gitl living alone in a male dominated society. If it is true than i muat say you should make some changes in the concluding lines and it would be perfect…… I am sorry if i assumed it wrongly

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